गिजुभाई बधेका - दक्षिणा मूर्ति, भावनगर


 

1920 मे स्थापना

गिजऊभाई बधेका, मूलक्षणकर भट्ट ओर साथीयो के सहायसे संचालन 

गिजऊभाई ने वर्ष: 1927 मे मोंटेसरी मेथड के उपर एक किताब लिखी हैं-

राष्ट्र का सर्वोत्तम बाल मंदिर याने दक्षिणा मूर्ति।जहा आज के दिन प्री प्रायमरी के अध्यापक तालिम केंद्र कार्यरत हैं-

गिजूभाई बधेका: शिक्षाकर्मी, शिक्षाविद और शिक्षा सुधारक ओर प्रयोग धर्मी शिक्षाविद के रूप मे जाने जाते हैं..

उपनाम: मूंछाली मां (મુંછાળી માં...) अर्थ: एक ऐसी मा जिस को मूंछ है..

समग्र विश्व मे भारत को की सदियों से शिक्षा का केंद्र माना जा रहा है,  शिक्षा के अनेक महारथी यो के नाम के साथ गिजऊभाई बधेका का नाम गिने चुने शिक्षा कर्मिऑ के नाम के साथ गिनती मे हैं, समग्र विश्व के शिक्षा कर्मी के रूप मे गीजुभाई का नाम हमे दिखाई देता है, जो हमारे लिए गौरव की बात हैं- वर्ष:  15 नवंबर 1885 को भावनगर मे पैदा हुए गिजूभाई व्यवसाईक रूप में एडवोकेट के तौर पर काम करते थे। उस जमाने मे भावनगर के राजा ने उन के शिक्षा से जुड़े प्रयोगों को आगे बढ़ ने के लिए भावनगर मे उन्हे राज के माध्यम से जगह का दान दिया, तखतेश्वर के पास यह जगह आज विश्व मे पहचानी जाती हैं- गिजूभाई के जीवन निर्वाह के लिए वो वकिलात का व्यवसाय कर रहे थे। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा (3 से 5 साल) की आयु वाले बच्चो के लिए यहा काम करना शुरू किया, जिसे आज हम दक्षिणा मूर्ति बाल मंदिर के नाम से जानते रहे हैं। इस आयु वर्ष की  शिक्षा जिसे हम ECCE (अर्ली चाइल्ड ऐज्यूकेशन) के नाम से  पहचानते हैं। शिक्षा और खास तौर पर प्रारंभिक शिक्षा के लिए उन्होंने कई तरह नवाचार किए। भाषा, गणित, विज्ञान, तार्किक शिक्षा और सामाजिक दृष्टिकोण में इन के नवाचार को स्वीकृति मिली। गिजूभाई ने अपने शिक्षा से जुड़े कार्यों को धीरे धीरे आगे बढ़ाया। समय बड़ा बलवान है, आने वाले समय मे विश्वमे इसे गिजूभाई बधेका की शिक्षा व्यवस्था के नाम से जाना गया।जो आज भी जीवंत हैं।

 

गिजूभाई ने अपने कार्यों को लंबे समय तक अपने खुद के बिंदुओ को केंद्र में रखकर स्थापित किया था। दक्षिणा मूर्ति की स्थापना वर्ष: 1 ऑगस्ट 1920 में की गई थी।  इस समय शिक्षा व्यवस्था मे अंग्रेजों की शिक्षा व्यवस्था के नजरिए से देखा जाता था। इस तरफ गिजूभाई  ने शुरू शुरू में  वकिलात और बाद में उन्होंने पूर्ण समय के लिए दक्षिणा मूर्ति को संभाला। एक समय था, जब मैडम मांटेसरी के शिक्षा के प्रयोग विश्व में मैडम मांटेसरी मेथड के नाम से पहेचाने जाते थे। विश्व मे मेडम के शिक्षा से जुड़े कार्य किसी से छुपे तो थे नहीं। तब गिजूभाई ने मैडम मांटेसरी की शिक्षा व्यवस्था का अभ्यास किया। उस अभ्यास के माध्यम से गिजूभाई को लगा कि मैडम मांटेसरी की शिक्षा व्यवस्था में कुछ जो दक्षिणा मूर्ति से हटकर था वो था खिलोनों का शिक्षा मे उपयोग। उन्हे पता चल की जो अलग है वो अलग सिर्फ खिलौने हैगिजूभाई ने उसे पहले अपनी सोच के आधार पर निर्मित किया ओर उसे बच्चों के सीखने सीखाने के स्थानीय स्त्रोत से उसे तैयार करना चाहा।  स्थानीय सामग्री के माध्यम से कम दाम वाले खिलोने बनाने के लिए गिजूभाई सोच रहे थे। तब उन्हे मूलशंकर मो. भट्ट का सहकार प्राप्त हुआ। मूलशंकर मो. भट्ट जो की गिजूभाई के साथ काम कर रहे थे। वो भी एक शिक्षा कर्मी , विचारक ओर गिजूभाई के करीबी साथी थे। इस विषय में उन्हों ने एक किताब की प्रस्तावना मे लिखा है, गिजूभाई लिखित मांटेसरी शिक्षा व्यवस्थाक के नाम से एक किताब लिखी गई थी। वर्ष: 1927 में प्रकाशित हु। इस किताब में मूलशंकर मो. भट्ट ने लिखा है की, यह शिक्षा प्रणाली गिजूभाई ने अपनी समझ से मांटेसरी मेथड को केंद्र में रखकर बनाई हैं। इस शिक्षा प्रयोग में दर्शाए गए खिलोने भी पूर्णतः भारतीय और गिजूभाई बधेका के विचारो के अनुरूप हैं। इस के उपयोग मे आने वाले शैक्षिक खिलोनों के लिए वो लिख चुके थे की मेडम के खिलौने महंगे थे। उसे यहा प्राप्त करना संभव नहीं था। ऐसे हालत मे क्या करना उचित था वो ते नहीं कर पाए, आखिर मे उन्होंने खिलोनों के लिए भी काम किया। जो खिलो ने उन के खुद की सोच से भारतीय परिवेश मे स्वदेशी थे।

 

गिजूभाई के बारे मे लिखी गई एक किताब में भाषा शिक्षा के पेज: 99 पर लिखा है की मैडम मांटेसरी के खिलोने महंगे थे  और उपलब्ध करवाना आसान नहीं था। तब जाकर वर्ष: 1928 में गिजूभाई ने श्री जेचंद तलकशी एंड संस के मालिक से बनवाए।  जटाशंकर मिस्त्री, रतिभाई दोषी के साथ मिलाकर गिजूभाई ने इसे बनवाया। उन्हों ने पहली बार सम्पूर्ण भारतीय खिलोने बनाने का काम किया। जिसमे इंद्रिय विकास के:18, भाषा शिक्षा के:09, गणित शिक्षा के:8 और मुक्त व्यवसाय के:39 और अन्य खिलौनों को मिलाकर 138 उत्पादन कर रहे हैं। जैसे जैसे खिलौनों का प्रचार प्रसार हुआ, तब उसे अधिक बनाने की आवश्यकता पैदा हुई। आज भी हम गिजूभाई बधेका धारा प्रेरित पूर्व प्राथमिक शिक्षा में उपयुक्त खिलोने तैयार कर रहे हैं।

मैडम मोंटेसरी के खिलोने महंगे थे, उपलब्धता नहीं थी। उन के खिलोने के डिजाइन के अधिकार वपराश करता को नहीं मिलते थे। ऐसे समय में गिजूभाई बधेका, मूलशंकर मो.भट्ट और सुथारी काम के अनुभवी और आर्थिक रूप से खर्च उठाने में सक्षम  जेचंद तलकशी एंड संस के मालिक को साथ में रखकर उस का निर्माण शुरू किया। कुछ साल तक इसे क्रियान्वित करने के पश्चात जेचंद तलकशी एंड संस ने सुरेन्द्र नगर के वढ़वान स्थित जेठाभाई मिस्त्री को लकड़ी के खिलोने बनाने का काम सौंप दिया। कुछ सालो के अंतराल के बाद इस खिलोने बनाने के व्यवसाय को अमृतभाई दोषी ने चलाना शुरू किया। अमृतभाइ ने करीब करीब एक दशक तक इसे चलाया। अमृतभाइ परिवार के सदस्य और बच्चे इस व्यवसाय को आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे। इस कारण सुनिलभाई महेता इस व्यवसाय मे आए। इसे आज वर्ष: 1949 से संचालित कर रहे हैं।

 

पिछले 75 सालो से गिजूभाई बड़े के मार्गदर्शन से बनाए गए प्रथम भारतीय शिक्षा पयोगी खिलौनों को बनाया गया। इस काम को आज उन के विचारों के आधीन हाथ से बनाए जाने वाले खिलौनो को आज भी हम बना रहे हैं। हमारा ये काम समग्र भारत के पूर्व प्राथमिक के बच्चो और शिक्षा संस्थानों से जुड़े हुए लोगो के लिए हैं। पिछले 75 सालो से गुजरात के बढ़वान में यह खिलोने बन रहे हैं।

इस काम से जुड़ी जानकारी ओर मीडिया डाक्यूमेंट की जानकारी यहा शेर किया है।

हमारे पास उपलब्ध है।

 

ü विशेष जानकारी...

ü रेफ़रन्स मे दी गई किताबे..

ü फोटोग्राफ ओर मीडिया कवरेज रिपोर्ट...

ü वर्तमान निर्माण सामग्री के फोटोग्राफ ओर चित्र...

मेरा इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड से नम्र अनुरोध है की ....

गिजूभाई बधेका के शिक्षापयोगी हस्त निर्मित शैक्षिक खिलोने बनाने sunil maheta का राष्ट्रीय कीर्तिमान आप के माध्यम से इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड की गौरव समान रिकॉर्ड बुक मे नाम दर्ज करने का अनुरोध है।

 

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